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अब किसानो को मिलंगे 50 हजार रूपये प्रति हेक्टेयर PKVYV की योजना के तहत

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paramparagat krishi vikas yojana के तहत मिलंगे 50 हजार रूपये प्रति हेक्टेयर 

नमस्कार दोस्तों मैं हूँ अरुन और आज हम आपको केंद्र सरकार की खास योजना PKVY परंपरागत कृषि विकास योजना

के बारे में जानकारी देने वाले है  जिससे आपको प्राकृतिक खेती के लिए प्रति हेक्टेयर 50 हजार रुपये मिलेंगे

दोस्तों केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 5 जुलाई के अपने पहले फुल बजट में ‘जीरो बजट’ खेती

की घोषणा किया जीरो बजट खेती के तहत जरूरी बीज, खाद-पानी आदि का इंतजाम प्राकृतिक रूप से

ही किया जाता है  इसके लिए मेहनत जरूर अधिक लगती है, लेकिन खेती की लागत बहुत कम आती है

और मुनाफा ज्यादा मिलता है| दूसरी ओर, 15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों से कैमिकल और

पेस्टिसाइड का कम इस्तेमाल करने की सलाह दी| उन्होंने 14.5 करोड़ किसानों से कहा कि एक किसान के रूप में

हमें धरती मां को बीमार बनाने का हक नहीं है, दरअसल, उनका इशारा प्राकृतिक यानी आर्गेनिक फार्मिंग Organic

Farming को बढ़ावा देने पर था. इसीलिए दोस्तों आज हम आपको केंद्र सरकार की इस योजना PKVY

(Paramparagat Krishi Vikas Yojana) के बारे में जानकारी देने वाले है जिससे आपको प्राकृतिक

खेती के लिए प्रति हेक्टेयर 50 हजार रुपये मिलेंगे

ऐसी खेती में कीटनाशक और रासायनिक खादों (Pesticides and Chemical Fertilizers) का इस्तेमाल नहीं होता

paramparagat krishi vikas yojana

दोस्तों इस योजना paramparagat krishi vikas yojana के तहत तीन साल के लिए प्रति हेक्टेयर 50 हजार

रुपये की सहायता दी जा रही है. इस योजना से किसानों को जैविक खाद, जैविक कीटनाशकों और वर्मी कंपोस्ट आदि

खरीदने के लिए 31,000 रुपये (61 प्रतिशत) मिलता है.के तहत तीन साल के लिए प्रति हेक्टेयर 50 हजार रुपये की

सहायता दी जा रही है. इसमें से किसानों को जैविक खाद, जैविक कीटनाशकों और वर्मी कंपोस्ट

आदि खरीदने के लिए 31,000 रुपये (61 प्रतिशत) मिलता है

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Paramparagat Krishi Vikas Yojana PKVY Details Objective Benefits Know Everything in Hindi dlop

:- मिशन आर्गेनिक वैल्यू चेन डेवलपमेंट फॉर नॉर्थ इस्टर्न रीजन के तहत किसानों को जैविक इनपुट खरीदने के लिए तीन साल में प्रति हेक्टेयर 7500 रुपये की मदद दी जा रही है.

परंपरागत कृषि विकास योजना

:- स्वायल हेल्थ मैनेजमेंट के तहत निजी एजेंसियों को नाबार्ड के जरिए प्रति यूनिट 63 लाख रुपये लागत सीमा पर 33 फीसदी आर्थिक मदद मिल रही है.

:-  ऐसी खेती में कीटनाशक और रासायनिक खादों (Pesticides and Chemical Fertilizers) का इस्तेमाल नहीं होता.

:- आखिर सरकार की इस अपील के पीछे क्या मकसद है. क्या रासायनिक खादों के अंधाधुंध इस्तेमाल से धरती की उर्वरा शक्ति कम हो रही है या फिर लोगों के खराब होते स्वास्थ्य ने चिंता बढ़ा दी है?

सौ फीसदी आर्गेनिक स्टेट

दोस्तों भारत में सिक्किम ने खुद को जनवरी 2016 में ही 100 फीसदी एग्रीकल्चर स्टेट घोषित कर दिया था. उसने

रासायनिक खादों और कीटनाशकों को चरणबद्ध तरीके से हटा दिया. एपीडा (APEDA) के मुताबिक पूर्वोत्तर के इस

छोटे से प्रदेश ने अपनी 76 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि को प्रमाणिक तौर पर जैविक कृषि क्षेत्र में बदल दिया है

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इस राज्य ने यह खिताब यूं ही नहीं पाया है. उसने सिक्किम राज्य जैविक बोर्ड का गठन किया. सिक्किम आर्गेनिक

मिशन बनाया. आर्गेनिक फार्म स्कूल बनाए. ‘बायो विलेज’ बनाए. वर्ष 2006-2007 आते-आते केंद्र सरकार से मिलने

वाला रायानिक खाद का कोटा लेना बंद कर दिया. बदले में किसानों को जैविक खाद देना शुरू किया ,

किसानों को जैविक बीज-खाद उत्पादन के लिए प्रेरित किया |

रासायनिक खादों का इस्तेमाल बंद कर देंगे तो प्रोडक्शन घट जाएगा

सरकार आर्गेनिक खेती करने की अपील भले ही कर रही हो लेकिन किसानों को यह डर है कि अगर हम रासायनिक

खादों का इस्तेमाल बंद कर देंगे तो प्रोडक्शन घट जाएगा. यह चिंता कुछ कृषि वैज्ञानिकों की भी है. दूसरी ओर,

अंतरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष (IFAD) ने भारत व चीन में किए गए अध्ययनों के आधार पर इस बात की पुष्टि की है

कि जैविक खेती अपनाने से किसानों की आय में काफी बढ़ोत्तरी होती है. प्रमाणिक जैविक उत्पाद का बाजार में अच्छा

दाम प्राप्त किया जा सकता है. नेशनल सेंटर ऑफ आर्गेनिक फार्मिंग ने अपनी एक रिपोर्ट में इस बात का दावा किया है.

जैविक खेती से जुड़ी चुनौतियां

एग्रीकल्चर (Agriculture) इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर साकेत कुशवाहा कहते हैं कि भारत जैसे देश जहां पर 130

करोड़ लोग रहते हैं वहां ऑर्गेनिक खेती किसी चुनौती से कम नहीं है. क्योंकि ऐसी खेती में उत्पादन घटने की बड़ी

संभावना रहती है. ऐसे में खाद्यान्न की जरूरत कैसे पूरी होगी, जबकि हमारी जोत घटती जा रही है. दूसरी चुनौती यह

है कि जैविक खेती का बाजार क्या गांवों में मिलेगा? क्या जैविक उत्पादों को गांवों से शहरों तक लाने का कोई इंतजाम है?

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कुशवाहा के मुताबिक जैविक उत्पाद दो से तीन गुना महंगे होते हैं, इसलिए इसे उन्हीं जगहों पर बेचा जा सकता है

जहां की परचेज पावर अच्छी है. हालांकि सच्चाई है कि जैविक उत्पाद के इस्तेमाल से मेडिकल पर खर्च कम हो

परंपरागत कृषि विकास योजना

जाएगा. किसान के लिए चुनौती यह है कि वो इतनी जैविक खाद कहां से बनाएगा. कुशवाहा के मुताबिक सरकार यह

कर सकती है कि हर किसान को 25 फीसदी खेती पारंपरिक तरीके से करने के लिए प्रोत्साहित करे. जब किसानों को

इससे फायदा मिलने लगेगा तो वो खुद धीरे-धीरे ऐसी खेती बढ़ाने लगेंगे. आज भी कुछ किसान

अपने लिए बिना खाद वाला प्रोडक्ट तैयार करते हैं |

रासायनिक खाद और बंजर होती धरती

सीएसई (सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरमेंट) की स्टेट ऑफ इंडियाज एनवायरमेंट 2017 रिपोर्ट के मुताबिक,

देश की करीब 30 प्रतिशत जमीन खराब या बंजर होने की कगार पर है. यह कृषि के लिए मूलभूत खतरा है.

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राजस्थान, दिल्ली, गोवा, महाराष्ट्र, झारखंड, नागालैंड, त्रिपुरा और हिमाचल प्रदेश में 40 से 70 प्रतिशत जमीन

बंजर बनने वाली है दरअसल, देश को कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए यूरिया का इस्तेमाल हरित क्रांति

(1965-66) के बाद शुरू हुआ. लेकिन कृषि क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि जिस यूरिया को हम उत्पादन

बढ़ाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं वह धीरे-धीरे हमारे खेतों को बंजर बना रही है.

खेती के लिए प्रति हेक्टेयर 50 हजार रुपये मिलेंगे

इसके खतरे को समझने के लिए भारत ने नाइट्रोजन के आकलन के लिए साल 2004 में सोसायटी फॉर

कन्जरवेशन ऑफ नेचर (एससीएन) की स्थापना की. इससे जुड़कर करीब सवा सौ वैज्ञानिकों ने

इंडियन नाइट्रोजन असेसमेंट नामक एक रिपोर्ट प्रकाशित की. जिसमें इसके दुष्परिणाम बताए गए हैं |

इसलिए अब सरकार किसानों को जैविक खेती की ओर लौटने की अपील कर रही है. ऐसी खेती करने वालों को

आर्थिक मदद भी दे रही है. लेकिन किसान इसके लिए फिलहाल तैयार नहीं दिखते. आम किसानों में इस बात की

परंपरागत कृषि विकास योजना

चिंता है कि अगर वो रासायनिक खाद कम कर देंगे तो क्या अनाज और सब्जियां का उत्पादन पहले जैसा रह पाएगा?

गोरखपुर यूनिवर्सिटी में भूगोल विभाग के प्रमुख रहे प्रो. केएन सिंह के अनुसार जैविक खेती करने में चुनौतियां

बहुत हैं लेकिन हमें अंतत: अपनाना इसे ही पड़ेगा, क्योंकि रासायनिक खाद और कीटनाशक न सिर्फ हमारी

सेहत को नुकसान पहुंचा रही है बल्कि पर्यावरण के लिए भी खतरा है. हरित क्रांति आधारित खेती में जो

गेहूं-चावल की प्रजातियां हैं वो ज्यादा पानी और खाद पर निर्भर हैं. इससे जमीन बंजर होने का खतरा बढ़ रहा है.

कैसे पूरी होगी खाद की यह जरूरत

प्रो. साकेत कुशवाहा का कहना है फसल के लिए नाइट्रोजन जरूरी है. यूरिया में करीब 46 फीसदी नाइट्रोजन होता

है. एक हेक्टेयर में 120 किलो नाइट्रोजन चाहिए यानी लगभग 300 किलो यूरिया. जबकि आर्गेनिक कंपोस्ट में

नाइट्रोजन सिर्फ .05 फीसदी होता है. ऐसे में किसान इतनी खाद कहां से लाएगा, जबकि लोगों ने पशुओं को

रखना कम दिया है |

अब केंद्र सरकार स्वायल हेल्थ कार्ड बना रही है

किसान अपने खेतों में आमतौर पर सिर्फ यूरिया, फास्फोरस और पोटास डालता है जबकि सल्फर, आयरन और जिकं सहित 14 अन्य एलिमेंट की जरूरत होती है.

जैसे सरसों की खेती में जिंक डालना चाहिए. किसान को ऐसी शिक्षा कौन देता है? अगर वो जरूरत के हिसाब से

बैलेंस बनाकर रासायनिक खाद का इस्तेमाल करता तो खेती की इतनी भयावह स्थिति नहीं होती

इसलिए अब केंद्र सरकार स्वायल हेल्थ कार्ड बना रही है|

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